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मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
माखनलाल चतुर्वेदी एवं विलास बिहारी झा की जयंती पर हुआ कवि-सम्मेलन,गीता पुष्प शॉ को दिया गया स्मृति सम्मान
by
Arun Pandey,
April 04, 2026
in
बिहार
माखनलाल चतुर्वेदी एवं विलास बिहारी झा की जयंती पर हुआ कवि-सम्मेलन,गीता पुष्प शॉ को दिया गया स्मृति सम्मान
पटना, ४ अप्रैल। "मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक---" जैसी पंक्तियों से निर्मित बलिदान की भावना से सिक्त कविता पुष्प की अभिलाषा के कवि पं माखनलाल चतुर्वेदी और मानवता के कवि पं विलास बिहारी झा जैसे महान साहित्यकार आलस्य में पड़े मनुष्यों की निद्रा तोड़ते हैं। ऐसे ही साहित्य से मनुष्यता का निर्माण और समाज को मार्ग-दर्शन प्राप्त होता है। पं चतुर्वेदी एक महान स्वतंत्रता सेनानी, कवि और पत्रकार ही नहीं सच्चे अर्थों में भारतीय आत्मा थे। उन्हें यह महान संबोधन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने दिया था।
यह बातें बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में शनिवार की संध्या आयोजित जयंती-समारोह और कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि चतुर्वेदी जी जीवन-पर्यन्त राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा के लिए संघर्ष-रत रहे। स्वतंत्रता-संग्राम में जेल की यातनाएँ भी भोगी और हिन्दी के प्रश्न पर भारत सरकार को पद्म-भूषण सम्मान भी वापस कर दिया। पुष्प की अभिलाषा देश के लिए मर मिटनेवाले लाखों वीर सपूतों की अशेष प्रेरणा है।
पं विलास बिहारी झा को स्मरण करते हुए डा सुलभ ने कहा कि गद्य एवं पद्य में समान अधिकार रखने वाले मनीषी साहित्यकार पं झा एक अत्यंत मर्म-स्पर्शी गीतकार और बाल-साहित्य के प्रणम्य साहित्यकार थे। यश की लिप्सा से दूर रहे, इसलिए अपेक्षित सम्मान उन्हें नहीं दिया जा सका। दक्षिण-भारत में हिन्दी के विकास में उनका अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान था। वे छात्र-जीवन में ही कविता-सुंदरी से प्रेम कर बैठे। जीवन-पर्यन्त साहित्य की एकांतिक-साधना की। उसी में रमे रहे। उनकी बाल-कथाएँ ख़ूब लोकप्रिय हुईं।
समारोह के मुख्य अतिथि और राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग, बिहार के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि चतुर्वेदी जी एक बड़े साहित्यकार तो थे ही एक बड़े स्वतंत्रता-सेनानी भी थे। महात्मा गाँधी के अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए उन्होंने अवज्ञा-आन्दोलन में सक्रिए भागीदारी दी। राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत उनकी रचानाएँ अत्यंत प्रेरणा दायी हैं।
इस अवसर पर न्यायमूर्ति श्री कुमार ने वरिष्ठ लेखिका डा गीता पुष्प शॉ को पं विलास बिहारी झा बाल साहित्य साधना सम्मान से विभूषित किया। सम्मान स्वरूप डा पुष्प को पाँच हज़ार रूपए की सम्मान-राशि के साथ वन्दन-वस्त्र और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए ।
पं झा की पुत्री निभा चौधरी ने कहा कि उनके उपन्यास अकाल पुरुष, नए धान की गंध और लंगोटिया की साहित्य समाज में व्यापक चर्चा हुई। उनकी आत्मकथा सुनो मनोरम जो उपन्यास के शिल्प में लिखी गयी है, साहित्य में विशेष स्थान रखती है। उनके बाल-उपन्यास आठ हज़ार वर्ष का बालक के लिए उन्हें २००६ में भारत के सर्वश्रेष्ठ बाल-साहित्यकार का सम्मान मिला था।
दूरदर्शन, बिहार के पूर्व कार्यक्रम प्रमुख डा राज कुमार नाहर, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पधारे व्यंग्य के चर्चित कवि कुमार जगदली, सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, दूरदर्शन के पूर्व कार्यक्रम प्रमुख डा ओम् प्रकाश जमुआर तथा विभा रानी श्रीवास्तव ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ कवि जय प्रकाश पुजारी की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, शायर रमेश कँवल, डा रत्नेश्वर सिंह, शायरा शमा कौसर शमा, कुमार अनुपम, ओम् प्रकाश पाण्डेय बदनाम, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा मीना कुमारी परिहार मान्या, डा ऋचा वर्मा, डा आशा रघुदेव, अर्जुन प्रसाद सिंह, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, इन्दु भूषण सहाय, संजय लाल चौधरी, डा अमरेन्द्र मिश्र, अरुण कुमार श्रीवास्तव आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन के भवन अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज ने किया।
व्यंग्य के चर्चित लेखक बाँके बिहारी साव, इल्मी मजलिस के सचिव परवेज़ आलम, सच्चिदानन्द शर्मा, डा चन्द्र शेखर आज़ाद, उमाकांत ओझा, संजय कुमार आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।
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