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पटना/ छपरा यह पूरे बिहार की कहानी प्राइवेट स्कूलों में नामांकन की सिलसिला जारी है मनमानी फीस ऊंची कीमत पर किताबें और यूनिफार्म के नाम पर मनमानी कीमत की वसूली विधायक की जा रही है इस पर अंकुश के लिए छपरा जिला प्रशासन ने अच्छी पहल की है
पटना/ छपरा यह पूरे बिहार की कहानी प्राइवेट स्कूलों में नामांकन की सिलसिला जारी है मनमानी फीस ऊंची कीमत पर किताबें और यूनिफार्म के नाम पर मनमानी कीमत की वसूली विधायक की जा रही है इस पर अंकुश के लिए छपरा जिला प्रशासन ने अच्छी पहल की है
by
Arun Pandey,
April 05, 2026
in
बिहार
लेकिन, हाल के वर्षों में शिक्षा की आड़ में व्यापार के बढ़ते चलन ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। इसी गंभीर मुद्दे पर सारण के जिला पदाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने एक ऐसा प्रशासनिक हस्तक्षेप किया है, जो पूरे राज्य के लिए एक नजीर बन सकता है।
निजी स्कूलों द्वारा री-एडमिशन शुल्क, हर साल बदली जाने वाली ड्रेस और चुनिंदा दुकानों से महँगी किताबें खरीदने की बाध्यता ने एक ऐसा तंत्र खड़ा कर दिया है, जिसे डीएम ने अपने पत्र में "भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति" करार दिया है।
प्रशासनिक आदेश के प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु:
एकाधिकार पर प्रहार: स्कूलों द्वारा कमीशनखोरी के लिए निर्धारित दुकानों की व्यवस्था को भंग करना इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आर्थिक स्थिरता का प्रयास: कम से कम 3 वर्षों तक यूनिफॉर्म न बदलने का निर्देश मध्यमवर्गीय परिवारों को एक बड़ी राहत देगा। यह नियम स्कूलों को हर सत्र में नए डिजाइन के नाम पर वसूली करने से रोकता है।
पारदर्शिता की शर्त: 15 अप्रैल तक वेबसाइट पर सामग्री की सूची डालना यह सुनिश्चित करेगा कि स्कूल अंधेरे में रखकर वसूली न कर सकें।
अधिनियम का कड़ा पालन: अब केवल कागजी नहीं रहेगी कार्रवाई
बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) विधेयक, 2019 के प्रावधानों को धरातल पर उतारते हुए सारण प्रशासन ने जांच के लिए 10 सूत्री एजेंडा तैयार किया है। इसमें यू-डायस कोड से लेकर री-एडमिशन शुल्क की बारीकी से जांच शामिल है। यह कदम दर्शाता है कि प्रशासन अब केवल चेतावनी तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों की मान्यता और उनकी कानूनी जवाबदेही पर भी नजर रख रहा है।
निष्कर्ष: एक बड़े बदलाव की आहट
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ शिक्षा के लिए लोग अपनी जमा-पूंजी लगा देते हैं, वहां 20 लाख बच्चों के भविष्य के साथ जुड़ा यह आर्थिक शोषण एक बड़ी सामाजिक समस्या है। सारण डीएम वैभव श्रीवास्तव की यह पहल न केवल निजी संस्थानों की मनमानी पर लगाम लगाएगी, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में नैतिकता और पारदर्शिता को भी पुनः स्थापित करने का प्रयास करेगी। यदि अन्य जिलों में भी इसी तरह की सख्ती दिखाई जाती है, तो बिहार के लाखों अभिभावकों को इस शैक्षणिक टैक्स से मुक्ति मिल सकती है।
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